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डा. नारंग की हत्या बौद्धिकता की हत्या है

पं0 बाबा नंद किशोर मिश्र 

जिस समय दादरी का बिसाहड़ा कांड हुआ था उस समय देश के सेकूलरिस्टों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। इस गांव के लोगों को आज तक शिकायत है कि उनकी बात को सही ढंग से ना तो सुना गया और ना ही मीडिया के द्वारा सही ढंग से पेश किया गया। इसलिए इन लोगों ने आक्रोश व्यक्त करते हुए होली न मनाने का निर्णय लिया और किसी ने भी होली न मनाकर यह बता दिया कि इस देश की सेकूलरिस्ट मीडिया और नेता किस सीमा तक गिर चुके हैं, क्योंकि किसी ने भी बिसाहड़ा के लोगों के द्वारा होली न मनाने की घटना का संज्ञान नही लिया। राजनीति की इससे अधिक संवेदनशून्यता का कोई उदाहरण नही हो सकता।

अब आईए दिल्ली की ओर यहां एक डॉक्टर नारंग की कुछ दुष्ट लोगों ने हत्या कर दी है, हत्या करने वाले बंगलादेशी तथाकथित शरणार्थी मेहमान हैं, जिनको हाथ लगाना दिल्ली की केजरीवाल सरकार अपनी प्रतिष्ठा के विरूद्घ मानती है और यह भी सोचती है कि इससे उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि को खतरा पैदा हो जाएगा। इस पर विचार करने से पूर्व पहले हम इतिहास की पन्नों की ओर चलते हैं जो हमें गला फाड़ फाडक़र बता रहे हैं कि यदि हम समय रहते नही चेते तो परिणाम हमारे लिए कितने घातक हो सकते हैं?

ई.पूर्व 326 में पर्वतेश्वर पुरू से विश्वप्रसिद्ध युद्ध के लिए जब सिकंदर ने झेलम पार की तो उसके पास कुल छ: हजार घुड़सवार सैनिक थे। इन छ: हजार सैनिकों के बल पर उसने पुरू की डेढ़ लाख की सेना को हराया..उसके बाद जंगलों की शिवि जनजाति का समूल नाश किया, योद्धा मानी जाने वाली कठ जनजाति ( वे ही जिनकी रचना कठोपनिषद है) का समूल नाश किया और भी जाने कितना कत्लेआम किया और यह सब किया सिर्फ छ: हजार सैनिकों के बल पर….

पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हरा चुके बाबर की महत्वाकांक्षाएं बढ़ीं तो एक साल बाद ही उसने 16 मार्च 1527 को तात्कालिक बड़े भारतीय शासक राणा सांगा पर आक्रमण कर दिया। इतिहासकार रशबुक बिलियम्स के अनुसार बाबर के पास पंद्रह हजार सैनिक थे और राणा सांग के पास उसके आठ गुना एक लाख बीस हजार, बाबर ने महाराणा को बुरी तरह हराया। 1556 के पानीपत के दूसरे युद्ध में जब हेमू से बैरम ख़ाँ (अकबर) भिड़ा तो उसके पास सिर्फ सात हजार सैनिक थे और हेमचन्द्र के पास पूरे पौने दो लाख, हेमू डेढ़ घंटे में ही हार गया।

यह सच है कि इन घटनाओं को जिस तरीके से पेश किया गया है वह इसप्रकार नही है, सच दूसरा है, परंतु यदि इतिहास में हमें इन घटनाओं को इसप्रकार पढ़ाया जाता है तो इसका एकमात्र कारण यही है कि हम बड़ी संख्या में होकर भी विदेशियों की छोटी सेना के सामने भी हार गये हैं, और उसका एक ही कारण हमें बताया जाता है कि हमारे भीतर एकता का अभाव था।

लेखक उपरोक्त तीनों उदाहरणों से असहमत होते हुए भी इनसे इस सीमा तक सहमत है कि हम आज भी कहीं बिखरे हुए हैं। जातिवाद और क्षेत्रवाद के साथ-साथ भाषावाद हमें बिखंडित कर रहा है और हमारे सेकूलर राजनीतिज्ञ अपनी राजनीतिक रोटियां सेककर हमारा मूर्ख बना रहे हैं। इसलिए हमें समय रहते एकता का परिचय देने की आवश्यकता है। इन तीनों युद्धों में अत्यधिक सैन्य बल होने के बावजूद यदि भारत की हार हुई तो इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण था, तीनों बार भारत ने धर्मयुद्ध किया पर दुश्मन अत्यधिक क्रूर था और उसने हमें काट कर रख दिया। इसी बात को आधुनिक शब्दावली में कहें तो भारत सेकुलर था और आक्रमणकारी बर्बर..विश्व के किसी देश के किसी भी सदी का इतिहास उठा कर पढि़ए, बौद्धिकता हर बार बर्बरता के पांव तले निर्दयता से रौंदी गयी है।

डॉ नारंग की हत्या भी बर्बरता द्वारा बौद्धिकता की हत्या है। यह हत्या उस चुप्पी की सजा है जिसे नई भाषा में सेकुलरिज्म कहते हैं। ध्यान से देखिये, जिस देश में एक आत्महत्या पर चार महीने लगातार चर्चा होती है, उसी देश में यह निर्मम हत्या मुद्दा नही बन पाती तो इसका कारण हमारी वही चुप्पी है।

आपने देखा न, एक हत्या पर पचासों लाख मुआवजा लेने के बाद भी वे तीन महीने तक देश को हिलाते रह गए। क्यों? इसलिए कि फिर किसी की हिम्मत न हो उनकी ओर आँख उठा कर देखने की।

आपने देखा न, एक कायर आत्महत्या के लिए पूरे राष्ट्र को दोषी ठहरा कर उन्होंने पूरे विश्व से भारत की शिकायत की क्यों? इसलिए कि मारना तो दूर, कोई उनकी ओर आँख उठा कर देखे भी नही…आप चुप हैं तो रोज मरते हैं, वह गरजता है तो रोज मारता है। संख्या बल के भ्रम में मत पडिय़े, सात हजार सैनिकों के साथ भारत में घुसे बाबर का खानदान भारत में डेढ़ लाख से अधिक मन्दिर तोड़ सकता है, और पूरे देश को 300 वर्षों तक(1556 से 1857 तक) गुलाम बना सकता है तो अब क्या नहीं हो सकता है जबकि आप और हम पहले से अधिक अकर्मण्य और कायर हुए हैं और वे पहले से अधिक क्रूर..

ध्यान से देखिएगा तो दिखेगा, डॉ नारंग की हत्या में थोड़े से आप और हम भी मरे हैं। चुप्पी तोडिये नही तो धीरे धीरे सब मरेंगे..थोडा थोडा करके पूरी तरह मर जायेंगे। चिल्ला सकते हैं तो चिल्लाइये, गरज सकते हैं तो गरजिये, बरस सकते हैं बरसिए और यदि कुछ नही कर सकते तो रोइये,पर चुप्पी तोडिये, तभी जी पाएंगे।

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