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प्राचीन इतिहास

इस अनुभाग में भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में जानकारी दी जायेगी।

अशोक ने कभी बौद्ध धर्म नहीं अपनाया, हिन्दू समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने इतिहास बदला

अशोक ने कभी बौद्ध धर्म नहीं अपनाया, हिन्दू समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने इतिहास बदला

     मौर्यवंश के सभी शासक हिन्दू थे, अशोक भी| अंग्रेजों और बौद्धों की झूठी बातों पर ध्यान देने के बदले अशोक के शिलालेख पढ़े जायं, रोमिला थापर की पुस्तक में मिल जायेंगे | पेशावर का एक ग्रीक राजा मिनांदर बाद में बौद्ध बना, वरना भारत का कोई भी राजा कभी भी बौद्ध नहीं बना | किन्तु बौद्ध भिक्षुओं का ... Read More »

अकबर भी अपना सर झुकाता था भारत के इस वीर योद्धा के सामने

अकबर भी अपना सर झुकाता था भारत के इस वीर योद्धा के सामने

अकबर भी अपना सर झुकाता था भारत के इस वीर योद्धा के सामने : अकबर ने पूरे  भारत पर शासन किया था. अकबर से जुड़े कई बहादूरी के किस्से इतिहास में लिखे हुए है. लेकिन एक शक्तिशाली राजा और भी था, जिसके सामने अकबर का सर झुक जाता था. वह राजा इतना ज्यादा शक्तिशाली और बहादूर  था कि अकबर खुद ... Read More »

सम्राट अशोक ने कभी बौद्ध धर्म नहीं अपनाया, हिन्दू समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने इतिहास बदला

सम्राट अशोक ने कभी बौद्ध धर्म नहीं अपनाया, हिन्दू समाज को बांटने के लिए अंग्रेजों ने इतिहास बदला

मौर्यवंश के सभी शासक हिन्दू थे, अशोक भी| अंग्रेजों और बौद्धों की झूठी बातों पर ध्यान देने के बदले अशोक के शिलालेख पढ़े जायं, रोमिला थापर की पुस्तक में मिल जायेंगे | पेशावर का एक ग्रीक राजा मिनांदर बाद में बौद्ध बना, वरना भारत का कोई भी राजा कभी भी बौद्ध नहीं बना | किन्तु बौद्ध भिक्षुओं का भी सम्मान ... Read More »

विश्वात्मा भाषा : संस्कृत

विश्वात्मा भाषा : संस्कृत

राकेश कुमार आर्य भारत जब-जब भी भारतीयता की और भारत केे आत्म गौरव को चिन्हित करने वाले प्रतिमानों की कहीं से आवाज उठती है, तो भारतीयता और भारत के आत्मगौरव के विरोधी लोगों को अनावश्यक ही उदरशूल की व्याधि घेर लेती है। अब मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने कहीं संस्कृत के लिए कुछ करना चाहा है तो ... Read More »

अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत

अरब की प्राचीन समृद्ध वैदिक संस्कृति और भारत

अरब देश का भारत, भृगु के पुत्र शुक्राचार्य तथा उनके पोत्र और्व से ऐतिहासिक संबंध प्रमाणित है, यहाँ तक कि “हिस्ट्री ऑफ पर्शिया” के लेखक साइक्स का मत है कि अरब का नाम और्व के ही नाम पर पड़ा, जो विकृत होकर “अरब” हो गया। भारत के उत्तर-पश्चिम में इलावर्त था, जहाँ दैत्य और दानव बसते थे, इस इलावर्त में ... Read More »

वैदिक काल में राज्य व्यवस्था

वैदिक काल में राज्य व्यवस्था

युध्ध के बाद बाणशैया पर पडे भिष्म युधिष्ठिर को पूरा राजधर्म समजाते हैं । हमें पता चलता है कि उस वैदिक काल में राज्य व्यवस्था कैसी थी । वेदव्यास जी द्वारा रचित महाभारत विश्व के असाधारण ग्रंथों में से एक है। राजनीतिक दृष्टि से महाभारत का महत्व सर्वाधिक है। इस ग्रंथ में राजधर्म के विविध अंगों की विविध दृष्टियों से ... Read More »

एलिया में एक वाटिका

एलिया में एक वाटिका

सीता एलिया श्री लंका में स्थित वह स्थान है जहाँ रावण ने माता सीता को बंदी बना कर रखा था। माता सीता को सीता एलिया में एक वाटिका में रखागया था जिसे अशोकवाटिका कहते हैं।  जब हनुमान जी सीता माता को ढूंढते हुए सीता एलिया की पहाड़ी पर पहुंचे तब उनकी तलाश पूरी हुई। यहाँ पर उनके पैरों के निशान आज तक मौजूद हैंजो कुछ बहुत बड़े हैं और कुछ बहुत छोटे। सदियाँ बीतने के बाद भी यहाँ हनुमान जी के चरणों के चिन्ह आज तक ज्यों के त्यों पथ्थरो पर क्यों हैं? क्योंकि यह वह स्थान है जहाँ श्री राम जी की भक्ति में लीन श्रीहनुमान को आठवी सिध्धि प्राप्त हुई थी जिसे इष्टवम कहते हैं। जब उन्होंने माता सीता की खोज की तो वे इस आनंद में झूम रहे थे कि उन्होंने प्रभु श्री राम द्वारा दियाकार्य पूरा कर लिया है। उन्होंने इस पहाड़ी पर खड़े होकर श्री राम जी के चरण कमलों का ध्यान किया तो उन्हें एक अद्भुत अनुभव हुआ। यह वो अनुभव है जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। भक्त का भगवान से एक हो जाने का यह अनुभव शब्दों की सीमा से परे है। इष्टवम वो सिद्धि है जिससे कि एकयोगी खुद को परम शक्ति के साथ एक हुआ पाता है। सीता एलिया वह स्थान है जहाँ हनुमान ने अपने भगवान् के साथ एकात्मकता का अनुभव किया। इसीलिए रामायणमें सीता की खोज वाले अध्याय (जिसे वाल्मीकि की रामायण में सुन्दर काण्ड कहा गया है ) को सबसे श्रेष्ट माना गया है। वेद वेदांतो का सार और पुराणों का निचोड़ सब उसएक अनुभव की और इशारा करता है जो वर्णन से परे है। वही अनुभव जो हनुमान जी को इस स्थान पर हुआ था। हनुमान जी का समुद्र पार करना और माता सीता को ढूँढना।  समुद्र के एक तरफ श्री राम हैं और दूसरी तरफ माता सीता। जब वे सीता एलिया की पहाड़ी पर खड़े होकर यहध्यान कर रहे थे तब उन्हें अहसास हुआ कि राम और सीता दोनों उनके मन में ही हैं। और समुन्दर भी उनके मन में ही है। हम इस वर्णन को यही तक छोड़ते हैं क्योंकि यहवो अनुभव है जिसके ऊपर दर्शन शास्त्र की हजारों किताबे लिखी गयी है, भक्ति कवियों ने महाकाव्यों की रचना की है। सीता एलिया के परिचय के लिए इतना बताना काफीहै कि यहाँ पर हनुमान जी ने अपनी सभी 8 सिध्धियों को प्रदर्शित किया है। उदाहरण के तौर पर एनिमा नामक सिध्धि से वे परमाणु से छोटा आकार भी धारण कर लेते थे।  इसीलिए यहाँ कुछ पैरों के निशान अति सूक्षम हैं और कुछ बहुत बड़े। हनुमान जी को अमर होने का वरदान प्राप्त हुआ था। श्री राम ने अपने जीवन काल के अंत में हनुमान जी को उनके भक्तों की रक्षा का दायित्व सौंपा था। हनुमान जी हरजगह हैं लेकिन उन्होंने स्थायी तौर पर सीता एलिया को रहने के लिए चुना क्योंकि यही वह स्थान है जहाँ उन्हें राम जी के साथ एकाकित्व का अनुभव हुआ था और यही वहस्थान है जहाँ वे श्री राम जी की भक्ति में हमेशा लीन रह सकते हैं। सीता एलिया में वानरों के अलावा कुछ इंसान भी हैं जो हनुमान जी की सेवा और भक्ति में लीन हैं। कुछ प्राचीन ग्रंथो में इन्हें मातंग कहा गया है। ये बहुत ही कम संख्या में है। श्री लंका की मुख्य वन जाति जिन्हें वेद्दा कहा जाता है, यह मातंग लोग उनके जैसे ही है लेकिन यह लोग भविष्य जान सकते हैं। इनके पास एक अनूठी विद्या होती हैजिसके तहत उन्हें इस धरती के कण कण का भूतकाल और भविष्य काल मालुम होता है। लेकिन ये लोग भविष्य कुछ विशेष परिस्तिथियों में ही बताते हैं। कलियुग में : कलियुग के रिकार्डेड इतिहास में भी कुछ ऐसी घटनाएँ जो सीता एलिया के सम्बन्ध में बहुत महत्वपूर्ण हैं। करीब 2600 साल पहले सिंहपुरा (जहाँ आज का गुजरात है,भारत में ) का एक राजा था जिसका नाम था सिन्हाबाहू। उसके सबसे बड़े बेटे का नाम विजय था जो बहुत बिगडैल था। जब वह 18 साल का था तब उसने राज्य की प्रजाका जीना दूभर कर दिया। वह अपने साथियो के साथ एक दल में रहता था और जनता को परेशान करता रहता था। प्रजा ने राजा सिन्हाबहू से शिकायत की। विजय के नमानने के चलते राजा ने विजय और उनके साथियों को राज्य से निष्कासित करने का आदेश दिया। विजय और उसके 700 साथियों को बिना पतवार के जहाज में बैठाकरसमुद्र में भटकने के लिए छोड़ दिया गया। वह जहाज अंत में श्री लंका पहुंचा। वहां पर विभीषण के वंशज राज कर रहे थे। ... Read More »