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विश्वव्यापी आतंकवाद को खत्म करने के लिए ‘उग्रवादी सोच’ से लड़ना होगा !

आखिर हम सच स्वीकार करने से कब तक मुँह चुराते रहेंगे !

सतीश पेडणेकर

आतंक के खिलाफ जंग में 4.3 ट्रिलियन डाॅलर खर्च किये जा चुके हैं, लेकिन नतीजा क्या हासिल हुआ? इस्लामी आतंकवाद का सांप तो मरा नहीं, लाठी टूट गई। इस्लामी आतंकवाद खत्म होने के बजाए बढ़ता ही जा रहा है, अब उसने वैश्विक रूप ले लिया है। इस्लामी आतंकवाद दुनिया के इतने देशों में फैल चुका है कि इससे आतंकवाद खत्म नहीं होने वाला क्योंकि इस्लामी आतंकवाद इस्लाम के सिद्धांतों पर आधारित गैर-मुस्लिमों या काफिरों से नफरत और इस्लामी व्यवस्था लागू करने के लिए संघर्ष करने वाला हिंसक आन्दोलन है। इसलिए जब तक इस्लाम नहीं बदलता तब तक वह सोच भी नहीं बदलने वाली। आतंकवाद की विषबेल को खत्म ही करना चाहते हैं तो उग्रवादी इस्लाम की विचारधारा से ही मुकाबला करना पड़ेगा।

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लेकिन इस मुद्दे पर दुनिया के बड़े देश एकजुट नहीं हैं। अमेरिका के Ex-राष्ट्रपति ओबामा कह चुके हैं कि आईएस तो गैर-इस्लामिक संगठन है, उसका इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। इसी तरह डैमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन भी नहीं मानतीं कि लड़ाई उग्रवादी इस्लाम से है। कोई भी इस लड़ाई को उग्रवादी इस्लाम से नहीं जोड़ना चाहता। आतंकवाद को खत्म करना है तो उग्रवादी इस्लाम से लड़ना ही होगा।

भारत भी उसी पलायनवादी प्रवृत्ति का शिकार है। भारत कहता है कि धर्म और आतंकवाद का कोई रिश्ता नहीं है। इससे बड़ा और कोई झूठ हो नहीं सकता। दुनिया में जो डेढ़ सौ से ज्यादा आतंकी संगठन हैं, वे यूं ही नहीं कह रहे हैं कि वे इस्लाम के लिए, इस्लामी व्यवस्था कायम करने के लिए लड़ रहे हैं। यदि भारत और दुनिया के तमाम देश अपने दुश्मन की सही पहचान नहीं करेंगे तो उससे लड़ेंगे कैसे?

इस्लामी आतंकवाद अब दुनिया भर में फैलता जा रहा है, सारी दुनिया इसका शिकार बन रही है। आईएस बहुचर्चित भले ही हो, लेकिन उससे भी खूंख्वार इस्लामी संगठन मौजूद हैं। बोको हराम ने वर्ष 2014 में आतंकवाद से हुई मौतों के मामले में आईएस को पीछे छोड़ दिया है। पिछले वर्ष बोको हराम के आतंकी हमलों में 6644 लोगों की मौत हुई तो आईएस के हमलों में 6073 लोगों की। इन दोनों के हमलों में दुनिया में आतंकवाद से हुई कुल मौतों में से 51 प्रतिशत मौतें हुईं। दुनिया में कुल 530 आतंकवादी संगठन हैं, जिनमें से 33 तो पिछले साल ही बने हैं।

पहले 5 आतंकी संगठनों में से सभी संगठन इस्लामी संगठन ही हैं। लगभग 80 से 85 प्रतिशत वारदातें इस्लामी संगठनों की ओर से हो रही हैं। लोग भले ही कहते हों कि धर्म और आतंकवाद का कोई रिश्ता नहीं है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन दिनों आतंक पर इस्लाम का एकाधिकार हो गया है।

हालांकि इस्लाम के किसी गं्रथ में आतंकवाद का समर्थन नहीं किया गया है, मगर काफिरों से संघर्ष करने की बात 100 से ज्यादा जगह कही गयी है।

यही सोच इस्लामी आतंकवाद का कारण बनती है। वे मदरसे भी आतंकवाद की जन्मस्थली बनते हैं जहाँ असहिष्णुता की शिक्षा देने वाले धार्मिक ग्रंथ ही पढ़ाये जाते हैं। इस्लामी आतंकवाद की दारुण त्रासदी यह है कि आतंकवादी वारदात करने वाले भी मुस्लिम होते हैं और उसके सबसे ज्यादा शिकार भी मुस्लिम ही होते हैं। इससे इन दिनों काफिर कम और मुसलमान ही ज्यादा मर रहे हैं।

ज्यादातर इस्लामी आतंकी संगठन उन मुस्लिमों को भी निशाना बनाते हैं, जिनके बारे में उनका ख्याल है कि वे इस्लाम के रास्ते पर नहीं चल रहे हैं। तालिबान और बोको हराम का निशाना वो मुस्लिम भी बन रहे हैं, जिन्हें वे पथभ्रष्ट मुस्लिम मानते हैं।

इतनी बड़ी संख्या में इस्लामी आतंकी समूहों का होना इस बात का प्रतीक है कि ये संगठन तो किसी गहरी बीमारी के प्रतीक भर हैं। इस समस्या की जड़ में है! ‘गैर-मुसलमानों के विरुद्ध सशस्त्रा इस्लामी जिहाद करने की सीख। दुनिया को मोमिन और काफिर, अल्लाह और शैतान अथवा दारुल हरब और दारुल इस्लाम में बांटकर देखने की प्रवृत्ति।’’ दुनिया में जहां-जहां जिहादी आतंकवाद सिर उठा रहा है, वहां की मूल समस्या यही है। ये राजनैतिक इस्लाम है जिसका मूल तत्व सारी दुनिया को एक इस्लामी झंडे के तले लाना है। इसका उद्देश्य एक ऐसी दुनिया बनाना है जहां इस्लाम के अलावा किसी ओर चीज को मान्यता नहीं होगी।

इस्लामी समाजों के लोग अपने उलेमाओं, मजहबी संस्थानों के शिकंजे में, उनकी कैद में हैं। उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने तथा तुलनात्मक रूप से जीवन और विचारों का परखने का अवसर नहीं है। किंतु यदि स्वतंत्रा विश्व, गैर-इस्लामी समाज जिहादी राजनाति को ठीक-ठीक पहचान कर उपाय सोचे तो दिखेगा कि जिहादियों से, उनकी गतिविधि और विचारधारा से खुली, लम्बी लड़ाई की तैयारी करते ही वे कमजोर पड़ने लगेंगे। वे हार नहीं मानेंगे, किंतु हार जायेंगे। उनकी मजहबी मान्यताओं को ‘रिलीजियस बिलीफ’ या ‘भावना’ के नाम पर छूट नहीं देंगे, जिनसे जिहादियों को शक्ति मिलती है, तब जिहादियों को अपनी सभी वैचारिक प्रस्थापनाओं का बचाव विचारों से ही करना पड़ेगा। यह उनकी नहीं, उन इस्लामी विचारों की कमजोरी है जिनसे वे परिचालित होते हैं।

आम मुस्लिम भी पूरे विश्व में इस्लामी राज होने, इतिहास, मानवता और शरीयत आदि के बारे में अति संकीर्ण नजरिया रखने और खुद के एकमात्रा सही समुदाय होने आदि बुनियादी इस्लामी सिद्धांतों के बारे में भ्रम में ही हैं। उन भ्रमों से ही जिहादियों को शक्ति मिलती है। जब स्वतंत्रा विश्व आसान समाधान की दुराशा छोड़कर इस्लामी व्यवहार का विज्ञान समझ लेगा, उसी दिन से जिहादी आतंकवाद का सदा के लिए खात्मा होना आरंभ हो जाएगा।

– ‘प्रथम प्रवक्ता’ 16.12.15

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