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खौफ के साये में तीन तलाक का विरोध करने वाली महिलाओं का परिवार

तीन तलाक का विरोध करने के बदले इन महिलाओं को गालियां और धमकियां मिल रहीं है। इन महिलाओं को समुदाय से बाहर करने किए जाने की बातें भई की जा रही हैं। इस विरोध के बाद मिल रही धमकियों के बाद शरीफा और लतीफा(बदले हुए नाम) के जहन में इतना खौफ बैठ गया है कि वे अपना असल नाम तक जाहिर नहीं कर रही हैं। ये दो महिलाएं कुछ महीनों पहले सामाजिक मंचों पर शरीयत के खिलाफ अपने विचार रख चुकी हैं।

इस्लाम में तलाक लेने की प्रथा तीन तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट कुछ महीने पहले ही सुनवाई कर फैसला सुरक्षित रख चुका है जबकि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड(AIMPB) ने काज़ियों को अडवाइज़री जारी कर निकाह के वक्त महिलाओं को तीन तलाक की व्यवस्था का विकल्प देने का फैसला लिया था। इस व्यवस्था पर सुप्रीम कोर्ट का फैसले का अब तक इंतजार है और मुस्लिम महिलाओं की स्थिति खराब होती जा रही है। महिलाएं AIMPB के हाल में जारी किए गए बयान का विरोध कर रही हैं, जिसमें तीन तलाक की प्रथा के साथ चलने वालों के समाज से बहिष्कार की बात कही गई है।

शरीफा का निकाह जून 2016 में हुआ था। उनका शौहर रोजाना छोटी-छोटी बातों को लेकर उनका शोषण करता था। मायके से मिले स्टील के बर्तनों जैसे मुद्दों को लेकर दोनों में झगड़े होते और बात मारपीट तक पहुंच जाती। ऐसी ही एक बात को लेकर झगड़ा हुआ और प्रेग्नेंसी के दौरान उन्हें शैंपू पीने के लिए मजबूर किया गया। इस वजह से उनका गर्भपात हो गया। हालत में सुधार होने पर उन्हें मायके भेज दिया गया और वॉट्सऐप मेसेज के जरिए उन्हें शौहर ने तीन तलाक भेज दिया। शरीफा इस्लाम के इस कानून से इत्तेफ़ाक नहीं रखतीं और उन्होंने इसपर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए। शांतिपूर्ण ढंग से शरीफा ने मौलानाओं से इस मुद्दे पर बातचीत की और तीन तलाक की वैधता के बारे में पूछा। शरीफा ने कई सामाजिक मंचों पर भी तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई।

शरीफा के मुताबिक, तीन तलाक के खिलाफ आवाज़ उठाने के कारण मुस्लिम नेताओं में गुस्सा है और उनका परिवार उस गुस्से की आग का निशाना बन रहा है।

शरीफा आगे कहती हैं कि कोंढवा में रहने वाला उनका भाई नमाज अदा करने के लिए रोज उमर मस्जिद जाता था। रमजान के महीने में मौलाना ने उसे तलब किया और उन्हें(शरीफा) को बातचीत के लिए उनके पास लाने को कहा। शरीफा के मुताबिक, ‘मैं जैसे ही मौलाना के पास पहुंची, मुझसे मोबाइल फोन बंद करने को कहा गया और जब मैंने ऐसा करने से इनकार किया तो जबरन बंद कराया गया। इसके बाद सामाजिक मंचों पर तीन तलाक के खिलाफ बोले जाने को गलत ठहराया गया और माफी मांगने को कहा गया। मैंने माफी नहीं मांगी और तीन तलाक की प्रथा की कानूनी वैधता पर सवाल खड़े किए।’ वह आगे कहती हैं, ‘उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी और कहा कि आगे से मैं बुर्का नहीं पहन सकती और न ही मैं मुस्लिम समुदाय का हिस्सा हूं।’ शरीफा ने बताया कि उस दिन के बाद उनके भाई को भी वहां नमाज अदा नहीं करने दी जाती और वह पास की दूसरी मस्जिदों में नमाज अदा करने जाते हैं।

लतीफा की कहानी भी कुछ-कुछ शरीफा जैसी है। 16 साल की उम्र में उनका निकाह हुआ और दो साल बाद उनका तलाक हो गया। उन्हें 7 महीने के बच्चे के साथ घर से निकाल दिया गया था। मुस्लिम सत्यशोधक मंडल द्वारा आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में उन्होंने भी तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाई और उसके बाद मीडिया में उनके इंटरव्यू दिखाए गए। बारामती पंचायत बागवां जमात की इसपर नजर पड़ी और स्थानीय मौलवियों को उनके पैरंट्स के घर भेजा गया। लतीफा ने बताया कि माफी न मांगे जाने की सूरत में अंजाम भुगतने की धमकी दी गई। लतीफा के पिता कहते हैं, ‘मैंने उनसे पूछा कि माफी क्यों मांगनी चाहिए? अगर मैंने कोई गलती की है तो मैं अल्लाह और पैगंबर से माफी मांगूंगा।’

उन्होंने आगे बताया कि इसके बाद पंचायत की ओर से बार-बार दबाव बनाया गया और आखिरकार स्टांप पेपर पर माफी मांगने के लिए कहा गया। उन्हें समाज से बाहर किए जाने की धमकी दी गई। बार-बार दबाव के बाद आखिरकार उन्होंने स्टांप पेपर पर माफी मांग ली और लतीफा ने लिखा कि जज्जबाती होकर उसने मीडिया में तीन तलाक के खिलाफ बातें कीं। हालांकि, लतीफा का मानना है कि वे अपने वादे से मुकर गए क्योंकि वे हमारे फोन कॉल्स नहीं ले रहे और हमें यह पता नहीं लग रहा कि उन्होंने ससुराल वालों से बात की है या नहीं।

Source : Nav bharat times

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